राजस्थान तृतीय श्रेणी शिक्षक तबादला बड़ी खबर: 8 साल से बंद हैं ट्रांसफर, 2.35 लाख शिक्षक परेशान, जानें पूरी रिपोर्ट

 

 

WWW.TEACHERSRAJ.COM — राजस्थान शिक्षा समाचार

तबादलों का बंद दरवाजा: आठ वर्षों से इंतजार में सबसे बड़ा शिक्षक वर्ग, परिवार और विद्यालय दोनों झेल रहे भारी दबाव

सरकार बदली, आदेश बदले, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षकों की फाइल वहीं ठहरी | प्रदेश के 2.35 लाख से अधिक शिक्षक प्रभावित
तृतीय श्रेणी शिक्षक तबादला धरना प्रदर्शन राजस्थान

जयपुर/जैसलमेर। राजस्थान में तबादला नीति और शिक्षकों के स्थानांतरण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। राज्य सरकार ने हालिया तबादला सत्र में विभिन्न विभागों के कर्मचारियों और शिक्षा विभाग के कई संवर्गों को स्थानांतरण की राहत दी है, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षकों (अध्यापक लेवल प्रथम एवं द्वितीय) के लिए आज भी तस्वीर नहीं बदली है। वर्ष 2018 के बाद से इस सबसे बड़े शिक्षक संवर्ग के नियमित स्थानांतरण पूरी तरह बंद हैं।

हर साल नई तबादला नीति बनने और प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद जगती है, लेकिन जमीनी स्तर पर परिणाम शून्य रहता है। नतीजा यह है कि हजारों शिक्षक वर्षों से एक ही स्थान पर, अपने गृह जिलों से सैकड़ों किलोमीटर दूर सेवा देने को मजबूर हैं।

विभागीय विसंगति: एक ही विभाग, दो मापदंड

शिक्षक संगठनों का आरोप है कि शिक्षा विभाग के भीतर अलग-अलग संवर्गों के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाए जा रहे हैं। जहां एक ओर व्याख्याता (Lecturer), प्रधानाचार्य (Principal) और द्वितीय श्रेणी शिक्षकों के तबादले समय-समय पर किए जा रहे हैं, वहीं तृतीय श्रेणी शिक्षकों को लगातार प्रतीक्षा सूची में रखा गया है। इस भेदभावपूर्ण रवैये के कारण शिक्षकों में गहरा असंतोष है।

पूरी तस्वीर बताता डेटा: संवर्गवार शिक्षकों की संख्या

प्रदेश में तृतीय श्रेणी शिक्षकों की भारी संख्या ही यह बताती है कि यह मामला कितना संवेदनशील और बड़ा है। वर्तमान में 2 लाख 35 हजार से अधिक शिक्षकों का यह संवर्ग पिछले आठ वर्षों से एक पारदर्शी और स्थायी स्थानांतरण व्यवस्था का इंतजार कर रहा है।

विभाग / संवर्ग शिक्षक स्तर कुल संख्या
प्रारंभिक शिक्षा अध्यापक लेवल प्रथम 1,00,116
अध्यापक लेवल द्वितीय 49,333
माध्यमिक शिक्षा अध्यापक लेवल प्रथम 45,216
अध्यापक लेवल द्वितीय 40,985
कुल तृतीय श्रेणी शिक्षक 2,35,650

तबादले रुकने से उत्पन्न सामाजिक और मानसिक संकट

लंबे समय तक तबादले नहीं होने का असर केवल नौकरी और कार्यस्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव शिक्षकों के पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन पर पड़ रहा है:

  • पारिवारिक बिखराव: सैकड़ों शिक्षक पति-पत्नी अलग-अलग जिलों में कार्यरत हैं, जिससे उनका पारिवारिक संतुलन बिगड़ चुका है।
  • बच्चों की देखभाल: छोटे बच्चों की पढ़ाई, परवरिश और बुजुर्ग माता-पिता की देखरेख में भारी कठिनाइयां आ रही हैं।
  • गंभीर बीमारी व दिव्यांगता: गंभीर बीमारियों से ग्रसित और दिव्यांग श्रेणी के शिक्षकों को भी गृह जिले में आने की राहत नहीं मिल पा रही है।
  • एकल महिला शिक्षकों की पीड़ा: दूर-दराज के क्षेत्रों में पदस्थापित एकल महिला शिक्षकों को सुरक्षा और सामाजिक स्तर पर अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रतिनियुक्ति का विकल्प और जिला कैडर पर बहस

शिक्षक संगठनों का यह भी आरोप है कि पारदर्शी तबादला नीति के अभाव में ‘प्रतिनियुक्ति’ (Deputation) का खेल चल रहा है। प्रभावशाली लोग प्रतिनियुक्ति के जरिए मनचाहे स्थानों तक पहुंच जाते हैं, जबकि आम और जरूरतमंद शिक्षक वर्षों तक केवल प्रतीक्षा करते रह जाते हैं। यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

दूसरी ओर, सरकार की ओर से समय-समय पर ‘जिला कैडर’ का तर्क दिया जाता है। लेकिन संगठनों का कहना है कि जब भर्ती प्रक्रिया राज्य स्तरीय परीक्षा और मेरिट से होती है, तो तबादलों को केवल जिला परिषद तक सीमित रखना न्यायसंगत नहीं है। सेवा संरचना और समान अवसर के सिद्धांत के तहत अंतर्जिला तबादले पूरी तरह बहाल होने चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!